daudne do khule maidano me in nanhen kadmon ko janab nindagi bahut tez bhagti hai bachpan gujar jane ke bad
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किसी नन्हे बच्चे की मुस्कान देख कर कवि ने क्या खूब लिखा है
दौड़ने दो खुले मैदानों में
इन नन्हें कदमों को जनाब
जिंदगी बहुत तेज भगाती है
बचपन गुजर जाने के बाद
हालात ने लिबास तो मैला किया
मगर
किरदार हम ने रखा है,
फिर भी सँवार कर
दोष कांटो का कहाँ हमारा है जनाब
पैर हमने रखा
वो तो अपनी जगह पे थे
इश्क न होने के सिर्फ दो तरीके थे…
दिल न बना होता,
या
तुम ना बनी होती…
तो अपनी अपनी सोच में है वरना
दोस्ती भी
मोहब्बत से कम नहीं होती…
आँगन में होती तो हम गिरा भी देते,
साहेब…
कम्बख़्त आदमी ने
“दीवार”
दिल मे उठा रखी है…
बहुत सी है जगह रहने की यूं तो ,.
मगर…
“औक़ात” में रहने का अपना ही मज़ा है !!....
माना की औरों की मुकाबले,
कुछ ज्यादा पाया नहीं मैंने,,
पर खुश हूं कि खुद गिरता संभलता रहा
पर किसी को गिराया नही मैंने !
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